क्या सूर्य सच में हमें ऊर्जा देता है? या हम से ऊर्जा लेता है?

सूरज ऊर्जा देता है या हमसे लेता है इसे तार्किक दृष्टि से समझना होगा। इसमें कुछ व्यवहारिक कुछ वैज्ञानिक तरीके होंगे।

व्यावहारिक तरीका-आम धारणा है प्रधानमंत्री हमारा पालन पोषण देखरेख तथा वित्तीय संसाधन पूरा करता है किंतु वास्तव में देखा जाए वह पूरी शक्ति हमारे द्वारा प्राप्त करता है जैसे हमारी वोटों से स्थापित हुआ हमारे टैक्स से उसने देश का संचालन किया यहां तक की उनकी पोशाक भी हमारे संसाधन से जुटाई गई। खैर यह व्यावहारिक तर्क है इसका वैज्ञानिक नहीं होना चाहिए।

वैज्ञानिक तर्क-

1-जब हम पानी गिराते हैं तो वह है जमीन में जाता है क्योंकि जमीन में पानी सोखने की क्षमता है। किंतु जब हम आग जलाते हैं तो उसकी लपटें ऊपर की ओर उठती है। इसका मतलब है आग ऊपर जाकर कहीं समा रही है। या आग को आसमान का कोई ग्रह खींच रहा है।
2-पाचन तंत्र सूर्य पर आधारित होना। जब आसमान में बादल घिर आते हैं तब हमारा पाचन तंत्र डगमगा जाता है क्योंकि सूर्य हमारे पाचन तंत्र से ऊर्जा खींचता है जिससे पाचन तंत्र गतिमान होता है तभी पाचन क्रिया संचालित होती है जिसे हम जठाराग्नि कहते हैं तथा जब सूरज की किरणें पाचन तंत्र पर नहीं पड़ती उसे हम मंदाग्नि कहते हैं। जिस प्रकार शरीर की ऊर्जा हमारे शरीर से निकलती रहती है उसी प्रकार पृथ्वी की ऊर्जा निरंतर निकलकर सूर्य को ऊर्जा प्रदान करता है, हमें सर्दी गर्मी का एहसास भी इसीलिए होता है सर्द दिनों में जब हम मोटे कपड़े पहन लेते हैं तो हमारे शरीर की ऊर्जा बाहर नहीं निकल पाती तथा कपड़े के ऊपर रहकर हमें गर्मी प्रदान करती है। इस प्रयोग को समझने के लिए प्लास्टिक का पतला आवरण पहनकर भी देख सकते हैं।
3-सूरज के पास अपनी कोई ऊर्जा नहीं है बल्कि वह आकाशगंगा की घुरी से घर्षण करता है तथा गर्म होता है इसका उदाहरण आप हवा देने वाले फैन से कर सकते हैं। कमरे को ठंडा करता है किंतु उसका केंद्र लगातार घूमने के कारण गर्म हो जाता है।
सूरज के अंदर अपनी कोई ऊर्जा नहीं है बल्कि वह आकाश मंडल के केंद्र में फसा होकर अपनी जगह भंवरे की तरह घूम रहा है तथा उसी से वह गर्म हो रहा है।
4-यदि उसके पास अपनी कोई उर्जा होती तथा सूर्य पत्थर का होता तो विस्फोट होकर बिखर जाता है यदि वह किसी धातु का होता है तो पिघल कर वह जाता


इसका प्रयोग करके देखा जा सकता है।
5-पृथ्वी का प्रारंभिक काल गर्म गोले के रूप में था क्योंकि वह कहीं से टूट कर तथा अपनी धुरी में घूमता तथा भटकता हुआ वर्तमान कक्षा में स्थापित हुआ लगातार घूमते रहने के कारण इसका स्वरूप नारंगी के आकार का हुआ जिस प्रकार नदी में बहते हुए पत्थर गोलाकार ले लेते हैं। किंतु यहां बताना चाहता हूं पृथ्वी आग का गोला थी तो उसकी अग्नि गई कहां। वास्तव में सूर्य अपनी कक्षा में अपनी ही जगह में स्थापित होकर परिक्रमा कर रहा है तथा उसके चारों ओर आकाशगंगा (हमारे ब्रह्मांड,) के खरबों ग्रह तथा तारे चारों तरफ घूम कर उर्जा प्रदान कर रहे हैं तथा आईने की तरह उसी ऊर्जा को सूर्य हमारी ओर वापसी का क्रम चलाता रहता है। तथा यह बात दावे से कही जा सकती है सूर्य के अंदर अपनी कोई ऊर्जा नहीं है वह हमारे गृह जैसा
अति विशाल तारा मात्र है।
6-प्रकृति के नियम अनुसार किसी भी ग्रह में इतनी क्षमता नहीं कि वह निरंतर अपनी उर्जा द्वारा जलता रहे। दीपक तभी तक जलता रहेगा जब तक कहीं से उसे ईंधन का सपोर्ट मिलता रहे। पृथ्वी भी प्रारंभ में सूर्य के समान जलता गोला थी यदि सूर्य का नियम लागू होता तो अभी तक उसी तरह जल रही होती।
7-सूर्य पृथ्वी से ऊर्जा खींचता है इसे दूसरे आयाम से समझे जब सूरज अपनी अधिकतम दूरी से 60 लाख किलोमीटर पास होता है तब उसे पृथ्वी को ज्यादा गर्म करना चाहिए किन्तु होता इसके विपरीत है। तथा जब अधिकतम दूर होता है तब ठंड पढ़ती है। इसका क्या कारण है प्रयोग करके पता करें।
एक कमरे के प्लाईवुड की मदद से दो भाग करें तथा प्लाईवुड में फैन के आकार का गोलाकार होल करें और उसमें फैन फिट करें, तथा फैन की पीछे अंगीठी जलाएं और फैन को चालू करें आप देखेंगे अंगूठी की ओर जा कमरे को ना गर्म कर फैन द्वारा दूसरी भाग में भेज रहा है। अब अंगीठी को पीछे तरफ खिसकाते जाएं अब पाएंगे कमरा पहले की अपेक्षा ज्यादा गर्म हो रहा है क्योंकि फैन के द्वारा आग खींचने की क्षमता कम हो रही है। इस सिद्धांत से पता चलता है सूरज पृथ्वी की ऊर्जा खीच रहा है। सूरज पृथ्वी से दूर होने पर ऊर्जा नहीं खींच पाता इसलिए पृथ्वी की ऊर्जा स्वयं को गर्म करने लगती है इसलिए गर्मी तेज लगती है
8-वर्षा होना सूर्य के द्वारा ऊर्जा शोषण पर आधारित है। कैसे-इसे विस्तार से जाने-सूरज जब पृथ्वी से अपनी ओर ऊर्जा खींचता है तब उसके साथ भाप के रूप में पानी के कारण ऊपर उठते हैं तथा आसमान में इकट्ठे होते रहते हैं क्योंकि वायुमंडल मैं पहुंचने के बाद सूरज ऊर्जा खींच लेता है किंतु उसे जल की जरूरत नहीं इसलिए बादल के रूप में नजर आते हैं। इसको एक और सिद्धांत के द्वारा समझ सकते हैं, सूर्य दिसंबर, जनवरी में दक्षिण होता है तथा पृथ्वी की काफी नजदीक भी उस समय अत्यधिक गर्मी पड़ना चाहिए किंतु होता इसके विपरीत है। किंतु जब भूमध्य रेखा पर आने के साथ उत्तर की सीमा छूने लगता है साथ ही पृथ्वी से काफी दूर होने लगता है उस समय व्यावहारिक दृष्टि से ठंड पढ़ना चाहिए किंतु तीव्र गर्मी पड़ती है। इससे स्पष्ट होता है सूरज हमारी ऊर्जा को खींचने के साथ-साथ पानी के कारण भाप के रूप में खींच कर बरसात होने का कारण बनता है।
9-किंतु प्रश्न उठता है जब सूर्य पूरी पृथ्वी की ऊर्जा खींच कर अपने पास ले जाता है तो उत्तरी ध्रुव ठंडा और दक्षिणी ध्रुव गर्म क्यों रहता है। जो कि ऊपर लिखे सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है क्योंकि सूर्य उत्तरी ध्रुव से काफी दूर रहता है जिससे वहां की गर्मी नहीं निकल पाती इसलिए उसको गर्म होना चाहिए किंतु होता बर्फ से ढका है। इसके लिए हमें एक बार फिर जमीन के अंदर बाहर के नदियों के ऊपर फोकस करना होगा। वास्तव में जिस प्रकार पर्वतों से निकलकर पानी समुद्र में जाता है तथा समुद्र से निकलकर गर्म भाप की नदी पर्वत की ओर चलती है उसी प्रकार पृथ्वी वर्ष में एक बार उत्तर से दक्षिण की ओर झुकाव लेकर घूमती है। इसे आप मिट्टी की नदी कह सकते हैं। जिससे सूरज मकर रेखा पार कर भूमध्य रेखा तक आता है तथा उत्तरी ध्रुव की ऊर्जा को निरंतर खींचता रहता है जिस कारण उत्तरी ध्रुव में सिर्फ बर्फ के टीले बनते जा रहे हैं तथा दक्षिणी ध्रुव मैं सूर्य के द्वारा पूरी गर्मी ले जाने के कारण वहां पर आग्नेय स्थान बन गया है। वर्षा होने का भी यही आधार है सूरज द्वारा भूमध्य रेखा पर पहुंचकर उत्तर की गर्मी को खींचता है तो उसके साथ भाव के रूप में वहां का जल भी आ जाता है तथा वही जल बद्दल बनकर वर्षा करते हैं तथा जब सूरज भूमध्य तथा मकर रेखा पारकर पुनः उत्तरी ध्रुव की और प्रस्थान करते हैं तो हिमखंड की ठंडी हवा जमीन को छूती हुई दक्षिणी ध्रुव की और बढ़ती है तो हमें सर्दी का एहसास होता है। उत्तरी ध्रुव मैं बढ़ता बर्फ का जमावड़ा हमारी पृथ्वी की उम्र का मीटर है जैसे-जैसे वह ठंडा होकर आगे बढ़ता जाएगा उसी तरह पृथ्वी की उम्र तथा रहने वालों का जीवन समाप्त होता जाएगा।

इसी तरह भूविज्ञान को लेकर हमारी गलत धारणा है। जैसे-पहाड़ से नदी क्यों निकलती है। भू वैज्ञानिकों का मानना है बरसात का पानी पहाड़ सोख लेते हैं तथा उसे नदी की धार बनाकर बहा देते हैं किंतु प्रश्न उठता है पहाड़ के ऊपर की चोटी तक पानी कैसे पहुंचता है जबकि पानी का सिद्धांत है नीचे की ओर सशोकना। बिना कोई प्रेशर की मदद से पानी ऊपर चढ ही नहीं सकता। प्रश्न उठता है क्या ईश्वर ने पहाड़ के नीचे या बीचो-बीच कोई मोटर लगा रखी है ,इस बात को समझने के लिए हमें समुद्र का मंथन करना होगा। क्योंकि पृथ्वी का सिस्टम एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।
ज्वार भाटा क्यों आते हैं? क्या ज्वार भाटा पंपिंग स्टेशन है? उत्तर होगा हां। इस पंपिंग स्टेशन का मतलब समझने के लिए हमें अपनी रहवासी भूमी के साथ अपने शरीर को समझना होगा। जैसे हम पानी पीकर पेशाब स्थान से निकालते हैं किंतु खून का सरकुलेशन नीचे से ऊपर होता रहता है उसी तरह हमारी पृथ्वी पहाड़ से पानी बहाकर समुद्र में मिलाती है किंतु जमीन के अंदर भी हजारों गैस (भाप) की नदियां हैं जो उल्टी बहकर पहाड़ की ओर जाती है। तथा इसी से भूकंप ज्वालामुखी बनते हैं। यहीं से ज्वार भाटा की उपयोगिता सिद्ध होती है जब ज्वार आता है तब समुद्र का तल ऊपर उठता है जिससे पानी सतह के ऊपर आता है। तथा भाटा आने पर प्रेशर द्वारा हवा पृथ्वी के अंदर बनी नसों के द्वारा पहाड़ की ओर अग्रसर होता है इसी सिद्धांत के कारण पहाड़ों से नदी बहती रहती है।
भूकंप ज्वालामुखी क्यों आते हैं इसे समझने के लिए हमें पृथ्वी का अध्ययन करना होगा जिसे हम अंदर तक देख नहीं सकते। वैज्ञानिकों ने देखने का प्रयास किया किंतु अभी तक लगभग 40 किलोमीटर आवरण तक पहुंच पाए। जब तक आवरण के नीचे की झिल्ली उसके नीचे का प्लाज्मा तथा उसके बीच का केंद्रक नहीं देख लेते तब तक भूकंप ज्वालामुखी का अध्ययन कर पाना कठिन होगा इसके लिए हमें तर्कपूर्ण बात को न्याय संगत मानना होगा। पृथ्वी को जानने के लिए हमें अंडा का अध्ययन करना होगा। अंडा खाने वाले जिस भाग को निकाल कर फेंक देते है वह धरती का आवरण है उसके साथ साथ आवरण के नीचे एक पतली झिल्ली होती है। जिस प्रकार अंडे में सफेद तरल पदार्थ तैरता रहता है उसी प्रकार पृथ्वी मैं झिल्ली के नीचे गर्म गंधक के रूप में पदार्थ तैर रहा है तथा उसी के ऊपर समुद्र से उल्टी चलने वाली नदियां (नस)हैं। तथा केंद्रक में जिस प्रकार अंडे में पीला भाग ठोस रूप लिए होता है उसी प्रकार हमारी पृथ्वी का केंद्रक है।

भूकंप क्यों आता है
जिस प्रकार पहाड़ से पानी निकल कर समुद्र मैं जाता है तथा साथ में रेत मिट्टी कीचड़ भी ले जाता है उसी प्रकार समुद्र से पहाड़ की ओर जाने वाली गैस की नदी अपने साथ समुद्र की गंदगी मिट्टी गर्म कणो के रूप में लेकर चलती है किंतु कहीं-कहीं पृथ्वी के ऊपरी तल की नमी के कारण नस की ऊपरी सतह पर चिपकने लगती है। इस नमी का कारण पृथ्वी के ऊपर बने जलाशय तथा गहरी नदियां भी हो सकती हैं जिसका पानी अधिक नीचे तक रिशता रहता है। तथा जब मिट्टी की परत ज्यादा वजनदार हो जाती है तब वह दरकने लगती है इसलिए बड़े भूकंप आने के पहले हल्के संकेत मिलते है। भूकंप से धरती तभी ऊपर उठती है जब नस के ऊपर चिपकी मिट्टी अचानक धसकती है। तथा आफ्टरसाक की वजह पृथ्वी का ऊपर उठना तथा धीरे धीरे अपनी जगह ग्रहण करना होता है कभी-कभी अचानक एक ही बार में पृथ्वी अपनी जगह ग्रहण करने की कोशिश करती है जिसके कारण दूसरा भूकंप भी उतनी ही तेजी का महसूस होता है किंतु प्रायः भूकंप के बाद धरती धीरे-धीरे ही अपनी जगह वापस जाती है।
ज्वालामुखी की वजह जाने। इसकी वजह पृथ्वी के
35 40 किलोमीटर नीचे तैरने वाला प्लाज्मा (गर्म गंधक) है। जब पृथ्वी का कुछ भाग ऊपर की ओर उठने लगता है तब प्लाज्मा को रोके रखने वाली प्लेट भी ऊपर की ओर उठने लगती है क्योंकि उसका सिद्धांत है पृथ्वी के 35 40 किलोमीटर रहना चाहे वह समतल जगह हो या हिमालय पर्वत, जिस कारण प्लेट भी उल्टे (वी )के आकार मैं उठने के साथ कमजोर होने लगता है तथा नीचे से दबाव पड़ने पर पृथ्वी के मुंहाने को फाड़ कर बाहर आने लगता है।
भूविज्ञानिको से अनुरोध-हमारे द्वारा सिद्ध किए गए अनुभव को तभी सही माने जब हमारे द्वारा लिखे गए छोटे से अध्ययन को प्रयोग करके देखें। आपका मानना है समुद्र में ज्वार भाटा आता है किंतु हम दावे से कह सकते हैं समुद्र ही नहीं छोटे बड़े नदी तालाब यहां तक कि छोटी सी कटोरी में रखें पानी में भी ज्वार भाटा उत्पन्न होता है क्योंकि उसकी गति सूर्य चंद्रमा है किंतु जिस प्रकार हाथी और चींटी की धड़कन चलती है किंतु हम हाथी की धड़कन महसूस कर सकते हैं किंतु चींटी की नहीं। उसी प्रकार ज्वार भाटा छोटे बड़े सभी जलाशयों में आता है। क्योंकि ज्वार भाटा मैं समुद्र से लगभग 1 करोड़ लीटर पानी में से 1 लीटर पानी ऊपर आता है किंतु जितना पानी आता है उतना हमारी आंखों से दिखता है किंतु इसी अनुपात से कटोरी का पानी उबलता हुआ नहीं देख सकते इसके लिए किसी पैरामीटर की जरूरत होगी।

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