भगवद्गीता का तत्व ग्यान जो सिर्फ धर्मात्मा लोगों को ही समझ आता है

भगवद्गीता सनातन धर्म के मानने वालों के सबसे प्रमुख ग्रंथों में से एक है. ये महाभारत के युद्ध उस हिस्से को चित्रित करती है जिसमें अर्जुन युद्ध करने से मना कर देता है और धर्म की रक्षा के लिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से वीरता से युद्ध करने को कहते हैं.

भगवद्गीता की खास बात यह भी है कि आप जितनी बार पढ़ोगे उतनी बार नित नए विचार और सवालों के जवाब आपको मिलते रहेंगे. दोस्तों गीता के एक एक स्लोक की व्याख्या करने में एक एक अलग आर्टिकल लिखा जा सकता है इसलिए इस पोस्ट में मैं सिर्फ वो बाते ही बताऊंगा जो मैंने खुद समझी हैं उनकी व्याख्या किसी और पोस्ट में बताऊंगा.

वैसे तो भगवद्गीता के तत्व ग्यान को कोई भगवद प्राप्त तत्व ग्यानी ही बता सकता है फिर भी विद्वानों के अनुभव और मेरे खुद के अनुभवों के आधार पर मै यहा अपने विचार व्यक्त करता हूं. त्रुटि के लिए क्षमा करें और कही गलत लगे तो कमेंट करके सही भी करें. 🙏

  1. गीता के श्लोकों को एक सार के रूप में समझें तो आप पाएंगे कि भगवान् आपको कुछ स्लोक में उन्हे कैसे भक्त पसंद हैं ये बताते हैं जबकि दूसरे स्लोक में वो खुद कैसे हैं ये बताते हैं. जादा गहराई से समझने पर आपको पता चलेगा कि भगवान् इंसान को अपने भीतर भगवान् के गुण पैदा करने के लिए प्रेरित करते हैं.
  2. जब आप और स्लोकों का अध्ययन करेंगे तो आप पाएंगे कि भगवान् कहते हैं कि एक ग्यान शील इंसान वास्तव में उनका ही रूप बन जाता है भगवान् श्रीकृष्ण ग्यानी पुरुष को अपने ही प्रतिरूप के रूप में स्वीकार करते हैं.
  3. कई स्लोकों में भगवान् बताते हैं कि वे इस दुनिया में बर्फ में पानी और माला में धागे के रूप में विद्यमान हैं. मतलब वो कण कण में व्याप्त हैं पर एक दूसरे स्लोक में वो बताते हैं कि ईश्वर अपनी संकल्प शक्ति से हर भूत यानी जीवित और जड़ वस्तु में व्याप्त हैं पर वास्तव में वो ( ईश्वर) उनमे नहीं हैं. इस बात का अर्थ ये है कि ईश्वर शक्ति रूप में हर वस्तु में है पर सच में वो उस रूप में हर वस्तु में नहीं है जैसा ज्यादातर हिंदू जन मानस समझता है. अगर इस बात का सही अर्थ विधर्मी समझ लें तो उनकी हिंदू ideology से ज्यादातर समस्या ख़त्म हो जाए. भगवान् अपने प्रभाव और संकल्प से खुद के हर जगह होने को स्वीकार तो करते हैं पर यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि वो सच में अपने धाम में सबसे निर्लिप्त मगन स्थित रहते हैं. मतलब वो सच में कण कण में नहीं हैं.
  4. दुनिया में इतने बुरे काम होते हैं फिर भी भगवान् क्यो सब ठीक नहीं कर देते? ये सवाल आपके भी मन में आता होगा. मैंने जो समझा वो ये है कि भगवान् एक स्लोक में के‍हते हैं कि ना तो उन्हे कोई प्रिय है ना ही अप्रिय. ये दुनिया कर्मो के आधार पर बनी है. अगर आप किसी पर अत्याचार होते देखते हो, तो वह आपको बुरा इसलिए लगता है क्योकि आप उस व्यक्ति के पूर्व जन्म के संस्कार नहीं जानते. पीड़ित व्यक्ति सच में अपने ही किसी पाप की वजह के परिणाम को भुगत रहा है. यही वजह है कि भगवान् इतना सब बुरा होने पर भी बचाने नहीं आते क्योकि उन्हे पता है कि आपके साथ ऎसा आपके ही प्रारब्ध के कारण हो रहा है
  5. अगर आप मुक्ति चाहते हैं तो आपको अपने अच्छे बुरे कर्मों में लगाव या अटैचमेंट को छोड़ना होगा. क्योकि बुरा करोगे तो नर्क और अच्छा करोगे तो स्वर्ग में जाना ही पड़ेगा. पाप का फल मिलने के बाद और पुण्य का शुख भोगने के बाद फिर से इसी दुनिया में आना होगा. और ये साइकल चलती रहेगी जब तक कि आप अच्छे और बुरे दोनों तरेह के कर्मो के फल का त्याग नहीं कर देते.
  6. जब तक दुनिया में किसी भी चीज को पाने की चाह है या किसी से लगाव या द्वेष है आपको पुनर्जन्म लेना पड़ेगा.
  7. जब आप खुद को ईश्वर की शक्ति रूप ईश्वर के गुणों से सिद्ध हो जाओगे तब मुक्त होगे.

दोस्तों और भी बहुत सी बातें हैं अगर आपने इस पोस्ट पर अच्छा रिस्पॉन्स दिया तो एसी और पोस्ट लाऊंगा.

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